
हिमाचल के पहाड़ दरक रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा खतरनाक तरीके से लाहुल का जाहलमा नाले से सटा पहाड़ दरक रहा है। पराशर के पहाड़ भी दरक रहे हैं। इसके साथ ही कोटरूपी पहाड़ का एक हिस्सा फिर से कोप बरपाने को अमादा है। मंडी आईआईटी के शोध में यह खुलासा हुआ है कि किन्नौर के पहाड़ हार्ड रॉक के हैं और अंदर से टूट रहे हैं, जबकि मंडी और लाहुल के पहाड़ सॉफ्ट रॉक से बने हुए हैं और यहां जमीन स्लाइड कर रही है। लाहुल का जाहलमा नाले से सटा पहाड़ तो अब फटने और दरकने के साफ संकेत दे रहा है। इस नाले में पानी का फ्लो अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है, जबकि इस नाले के पीछे पानी का कोई स्त्रोत तक नहीं है। मंडी आईआईटी के वैज्ञानिक मानते हैं कि यह पहाड़ कभी भी कहर बरपा सकता है।
इसी तरह का पहाड़ कोटरूपी भी है। मंडी से जोगिंद्रनगर की ओर जाते समय कोटरूपी का हिस्सा फिर फटने की कगार पर है, जबकि जोगिंद्रनगर से मंडी की तरफ वाले कोटरूपी पहाड़ में लगातार हलचल हो रही है और यहां पर लैंडस्लाइड भी हो रही है। देव पराशर के पहाड़ भी दरक रहे हैं और इनके दरकने की स्पीड पहले से ज्यादा तेज हुई है। कालंग गांव में फटती धरती भी इसी का प्रमाण है। सुंदरनगर, हनोगी और औट के पहाड़ भी कमजोर हैं और यहां पर फोरलेन निर्माण के कारण हिली चट्टानें सेटल ही नहीं हो पा रही हैं। इन पहाड़ों पर बरसाती पानी से बढ़े पैमाने पर लैंड स्लाइड हो रहा है। गुम्मा पहाड़ भी नमकीन पानी के साथ अंदर ही अंदर खोखला हो रहा है। आईआईटी द्वारा मंडी और कुल्लू में ही 6500 लैंडस्लाइड्स मैप किए गए। सैंडस्टोन लिथोलॉजी स्लाइड के लिए सबसे क्रिटिकल है। वर्षा से वेटिंग फ्रंट बढऩे, सॉइल सक्शन घटने और शीयर स्ट्रेंथ कम होने से फेलियर होता है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम
लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम पूरे भारतीय हिमालय के लिए विकसित किया गया है। यह रेनफॉल डेटा, मशीन लर्निंग मॉडल्स व टेरेन सससेप्टिबिलिटी मैप औरपर आधारित है। यहां नासा सेटेलाइट डाटा से 15 दिनों का रेनफॉल एनालिसिस किया जाता है।
कई पहाड़ टूटने को तैयार
मंडी आईआईटी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के प्रो. डेरिक्स बताते हैं कि पराशर, लाहुल का जाहलमा, कोटरूपी और सुंदरनगर में पहाड़ दरक रहे हैं। बांदला पहाड़ के हाल भी ऐसे ही हैं। इसके साथ ही हनोगी, औट में पहाड़ कमजोर हैं।