Himachal Pardesh में सर्पदंश से मौतों पर लगेगी लगाम, जीरो स्नेकबाइट डेथ के लिए बड़ी कार्य योजना तैयार

 

हिमाचल प्रदेश में अब सांप के काटने (सर्पदंश) से होने वाली अकाल मौतों को रोकने के लिए सरकार ने युद्धस्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। इस दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाते हुए प्रदेश में सर्पदंश को नोटीफायबल (अधिसूच्य) रोग घोषित कर दिया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब सांप काटने के हर एक मामले की सूचना स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य होगा।

जीरो स्नेकबाइट डेथ (शून्य सर्पदंश मृत्यु) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में एक ठोस राज्य स्तरीय कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस महत्त्वपूर्ण कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए शनिवार को धर्मशाला के जोनल अस्पताल में एक उच्च स्तरीय स्टेकहोल्डर बैठक का आयोजन किया गया।

बैठक में स्वास्थ्य, वन, शिक्षा, कृषि, जल शक्ति और पशुपालन सहित तमाम विभागों के अधिकारियों व विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में हर साल करीब 100 लोगों की जान सर्पदंश के कारण चली जाती है। अमृता इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज कोच्चि के डा. जयदीप सी मेनन ने बताया कि 70 से 80 प्रतिशत मामलों में सांप जहरीले होते ही नहीं हैं,

लेकिन अगर कोई जहरीला सांप काट ले, तो मरीज को शुरुआती अहम समय के भीतर अस्पताल पहुंचाना बेहद जरूरी है। इसका एकमात्र प्रमाणित और वैज्ञानिक इलाज एंटी-स्नेक वेनम है, जो प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध है। विशेषज्ञों ने इस बात पर एकमत होकर सहमति जताई कि जीरो स्नेकबाइट डेथ का सपना केवल स्वास्थ्य विभाग के दम पर पूरा नहीं हो सकता, बल्कि सभी विभागों के जमीनी समन्वय और व्यापक जन-जागरूकता से ही यह संभव होगा।

ज्वालाजी-नूरपुर में पायलट प्रोजेक्ट

अमृता इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज कोच्चि के डा. जयदीप सी मेनन ने बताया कि आईसीएमआर समर्थित जीरो स्नेकबाइट डेथ परियोजना वर्तमान में देश के सात राज्यों में चलाई जा रही है। हिमाचल में इसे कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी और नूरपुर ब्लॉक में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया है। इन दोनों ब्लॉक्स में मिलने वाली सफलता के बाद इस माडल को पूरे कांगड़ा और फिर समूचे प्रदेश में लागू किया जाएगा।

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