
जनाब ! हम टूरिस्ट के लिए जान देने को तैयार और हमने दी भी है। कश्मीरियत है यहां, कश्मीरियत है यहां, यहां कश्मीरियत है..। गुलमर्ग के दूरदराज गांव से रोजाना काहवा बेचने के लिए आने वाले मोहम्मद रफीक के कहे इन शब्दों में जहां पर्यटकों के लिए अपनापन नजर आया, वहीं कश्मीर के प्रति उनका लगाव और सम्मान भी साफ झलकता हुआ दिखा। दरअसल गुलमर्ग में आजकल खेलो इंडिया विंटर गेम्स का आयोजन किया जा रहा है, ऐसे में घाटी पर्यटकों से गुलजार हुई है और ‘जन्नत’ के कारोबार में भी इजाफा हुआ है। लेकिन कहीं ना कहीं टूरिस्ट की इस साल कम आमद यहां काहवे से लेकर कपड़े समेत कई तरह का कारोबार करने वाले स्थानीय लोगों को खलती हुई नजर आ रही है।
गुलमर्ग की बर्फ से लदी घाटी पर स्थित कंगदोरी में रोजाना 25 किलोमीटर दूर से कहवा बेचने आ रहे मोहम्मद रफीक बताते हैं कि पिछले वर्षों की तुलना में इस साल यहां पर्यटक कम पहुंचे हैं। इसका कारण रफीक पहलगाम अटैक को मानते हैं। उनके अनुसार पहलगाम अटैक के बाद कहीं ना कहीं टूरिस्ट के मन में डर भी बैठा है, हालांकि उनका कहना है कि टूरिस्ट का कश्मीर के लोगों के साथ और कश्मीर के लोगों का टूरिस्ट के साथ गहरा भाईचारा है। यहां के लोग पर्यटकों के लिए जान तक देने को भी तैयार रहते हैं। इसका उदाहरण वह पहलगाम अटैक के दौरान पर्यटकों को बचाते हुए मारे गए स्थानीय निवासी सैयद आदिल हुसैन शाह का देते हैं।
रफीक कहते हैं की टूरिस्ट का व्यवहार हमारे साथ अच्छा रहता है और हमारा टूरिस्ट के साथ। मोहम्मद रफीक के अनुसार जब पहलगाम अटैक हुआ तो हमारे लोग टूरिस्ट को अपने घर ले गए उन्हें अपने घर में रखा खाना-पीना दिया अपनी गाड़ियों में एयरपोर्ट तक छोड़ा, यह भाईचारे की ही तो मिसाल है। यही नहीं जब तक पर्यटक घर नहीं पहुंचे कश्मीर के लोग चैन से नहीं बैठे। मोहम्मद रफीक के मुताबिक कश्मीर की आवाम अमन और शांति के साथ जीना चाहती है। हम नहीं चाहते कि यहां कुछ भी ऐसा घटित हो जिससे पर्यटक कश्मीर से दूर हो जाए।
अपनी बात को जारी रखते हुए बातों ही बातों में मोहम्मद रफीक काहवे का जिक्र छेड़ देते हैं। वह बताते हैं कि यहां रोजाना डेढ़ सौ लोग बड़ी-बड़ी थरमस में काहवा बेचने पहुंचते हैं। कहवे का एक कप 50 रुपए में देते हैं। एक कहवा कप की कॉस्ट 20 से 25 रुपए तक आ जाती है। आजकल विंटर गेम्स लगी हुई है तो रोजाना 800 से 1200 रुपए तक कहवे का कारोबार हो रहा है। दिसंबर और जनवरी में 1500 से 2000 तक भी हुआ। पहले यह 3000 तक हो जाता था।
वह बताते हैं कि काहवे को यहां तक पहुंचाने में मेहनत बहुत लगती है। अपने गांव से गुलमर्ग तक वे टैक्सी में आते हैं और उसके बाद कंडोरी तक बर्फ से ढकी तकरीबन डेढ़ से दो किलोमीटर की पहाड़ी तक पैदल चलकर पहुंचते हैं। क्योंकि अगर गंडोला में बैठकर आएं तो 800 रुपए तक खर्च आ जाता है, इसलिए वह पैदल आते हैं और पैदल ही जाते हैं। हालांकि काहवा यहां 12 महीने बिकता है, लेकिन वह केवल 3 महीने टूरिस्ट सीजन के दौरान ही यहां काहवा बेचने पहुंचते हैं बाकी महीने घर में खेती-बाड़ी करते हैं।
गले की खराश मिटाता है काहवा
मोहम्मद रफीक के अनुसार इलायची, दालचीनी, केसर और शहद से तैयार होने वाला काहवा ना केवल हमारे पाचन तंत्र को मजबूत करता है, बल्कि गले की खराश और गले से जुड़े कई रोगों को भी मिटता है। कश्मीर आने वाला लगभग हर पर्यटक खुद को काहवे से दूर नहीं रख पाता।